"महाशिवरात्रि" का अध्यात्मिक अर्थ श्रीमद् भगवत गिता द्वारा

 



"महाशिवरात्रि" का अध्यात्मिक अर्थ श्रीमद् भगवत गिता द्वारा 

  हाशिवरात्रि एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है । यह एक पारंपारिक और महत्वपूर्ण पूजा विधि है जो हिंदू धर्म में शिव पूजा के दौरान की जाती है।  यह त्योहार हर साल फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। महाशिवरात्रि का महत्व हिंदू धर्म में बहुत अधिक है, और यह त्योहार भगवान शिव की महिमा और उनके प्रति भक्ति को दर्शाता है।

                   आज के दिन शिवलिंग की पुजा करते हैं । 

जिसमें मुख्य सामुग्री जल,दुध,दही,बेलपत्र,धतुरा का फुल,सफेद चावल इत्यादि चढ़ाते हैं।

                   चंदन की तीन रेखाए शिवलिंग पर बनाते हैं जो शिवलिंग की पवित्रता और शुद्धता दर्शाता है। जो आत्मा यह पार्ट बजाती है उनमें तिनों का ब्रह्म विष्णु शंकर के पार्ट का ज्ञान भरा है और ज्ञान पवित्र बुद्धि में ही ठहरता है जिसकी यादगार में ब्राह्मण तिन धागे का जनेऊ धारण करते हैं । तिन रेखा के बिच बिंदु दिखाते हैं । यह बिंदु शिव की आत्मा का प्रतिक है ।  कोई भी मुर्ति तब बनती है अथवा पुजनिय तब  जब श्रेष्ठ कर्म कीए हो वो कर्म कल्याणकारी हो ।" शिव "   का अर्थ ही है कल्याणकारी इसलिए सदाशिव वो सदा ही शिव है । कैसे❓ जब शिव भगवान इस सृष्टि पर साकार में आते हैं भक्तों की पुकार सुनकर आनाही पडता है❗ कब आते है❓श्रीमत भगवत गीता में उल्लेख है ।

                   अध्याय 4/7  " यदा यदा ही धर्मस्य ग्लार्निर भवती भारत....." 

अर्थात जब जब धर्म की ग्लानि होगी तब मैं आऊंगा इस वादे नुसार  ईश्वर जब इस सृष्टि पर साकार में आकर बाप,टीचर, सदगुरु के रूप में साकार मे पार्ट बजाते हैं। शिव वाली आत्मा जिस शरीर में प्रवेश करती है प्रवेष्ठुम नुसार श्रीमत भगवत गीता में,  अध्याय 11/54 नुसार

 " ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप। "

भावार्थ - ऐसा विधानरूप जानने पहचानने और ऐसे ही मुकरर रथ में भलीभांति तत्व पूर्वक देखने और उसमें प्रवेश करने में भी समर्थ हु । 

अधिक जानने हे हेतु 11/18, 11/38,9/17,15/15,

7/12   इन श्लोकों में भी इस बात का उल्लेख आया है । 

              " शिवलिंग "  शब्द में शिव है आत्मा जो स्वयं इस सुष्टि पर शंकर अव्यक्त मूर्ति में ( शरीर में ) आकर एसा पार्ट बजाती है / कर्म करके दिखाते हैं की उनके कर्मों को  सब मनुष्य अनुकलन करते हैं।

अध्याय 4/11-मम वर्तमान वर्तनन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: ......। मेरे कर्मोंका अनुकरन सब करते हैं।

अध्याय 4/13 - चातुर्वर्ण्यम् माया सृष्टगुणकर्मविभागश:।

तस्य कर्तारमपी विद्धि अकर्तारमव्यम्।

भावार्थ - मैंने गुण कर्म के विभाग अनुसार चार वर्णों को रचा था उसका कर्ता होने पर भी अकर्ता मुझ अक्षर को समझ लेते हैं ।

                     शिवलिंग कहते हैं  " लिंग " अर्थात शरीर । शिवलिंग शरीर और आत्मा की यादगार है जो प्रव्रुति है । आत्मा और शरीर/ रथ की प्रव्रुति ईश्वर कहते हैं यह सारा खेल है ही प्रक्रुति और पुरुष का । जो आत्मा इस सुष्टि पर सदा कायम होती है जिसे ही ," चारों युग परताप तुम्हारा" गायन पुजन होता है जो श्रेष्ठ कर्म करती है । 

                    मंदीरोमे शिवलिंग सदा ही अन्य मुर्तियों के बिच ही  स्थापीत  है क्यों की शिवलिंग का ही गायन है  "त्वंमेव माताच पिता त्वमेव " सारे जगत के तुही माता तुही पिता  जगतम् पितरम् वन्दे पार्वती परमेश्वर गायन है । विश्वनाथ,जगदपिता देव देव महादेव गायन पुजन होता है। 

अध्याय 11/38 त्वमाधिदेव: पुरुष: पुराण त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् |वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप | 

भावार्थ - हे अनंत रूप वाले! आप ही देवताओं में प्रथम हैं, आप ही आदि आत्मा हैं; पुरातन पुरुष हो आप ही ब्रह्माण्ड के परम विश्राम-स्थान हैं; आप ही ज्ञाता हैं, आप ही जानने योग्य हैं, आप ही परम लक्ष्य हैं। हे अनंत रूप,गुण वाले जगत आपके द्वारा विस्तृत हुआ है। 

                      शिवलिंग पर धतुरा का फुल चढ़ाते - जब ईश्वर इस सृष्टि पर आते हैं और नई दुनिया की स्थापना करते हैं पुरानी दुनिया  का विनाश का  कार्य करते इस कार्य में सहयोगी बनने वाली आत्माएं कांटे जैसी स्वभाव संस्कार वाली होती है अपवित्र भी होती है ।

                       आज के दिन श्रद्धा से उपवास भी रखते हैं । उपवास - अर्थात ऊपरवाले के साथ निवास करना ।

ऊपरवाला कौन? भगवान ऊपर है अर्थात ऊंची स्टेजमे रहनेवाला अध्याय गीता 6/5 

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।

आत्मैव ह्रात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन: ।।

भावार्थ:-अपने मन बुद्धि द्वारा ज्योति बिंदु आत्मा को ऊंची स्थिति में ले जाए आत्मा को अधोगति में ना जाने दे, क्योंकि ज्योति बिंदु आत्मा ही अपना मित्र है आत्मा ही अपना शत्रु है। 

अर्थात इस सृष्टि की वो आत्मा जीवन में रहते हुए  सबकुछ करते हुए स्वयं को सदा ही उपराम रखती है।  शंकर को पहाड़ी पर बैठे दिखाते हैं। उस आत्मा के सानिध्य में रहना उस आत्मा का चरित्र ,उस आत्मा को याद करना जिससे हम भी उनके जैसे ही बने " जैसे को देखोगे वैसे ही बनोगे "।

                    रात्रि - शिवरात्रि कहते हैं । रात्रि का शिव के साथ क्या संमंध है। "रात्रि " शब्द अंधकार को दर्शाता है । अज्ञानता का अंधकार जब सारी सृष्टि अंधकार मे डुबती  है । हम कौन हैं ❓ हम स्वयं को ही भुल जाते और दुखि होते विकारी पतित बनते तब ज्ञान की रोशनी देने स्वयं शिव इस सृष्टि  पर आते हैं और ज्ञान  की रोशनी से अंधकार को मिटाते हैं ।

                     यह कार्य इस सुष्टि पर प्राक्टिकल में अध्यात्मिक विश्व विद्यालय के द्वारा चल रहा है सारी सुष्टि को वसुदेव कुटुम्बकम बनाने का कार्य इस विद्यालय में चल रहा है जहां स्वयं ईश्वर टिचर के रूप मे राजा बनानेकी पढ़ाई पढा रहे हैं। स्वकल्याण  हेतु अवश्य पधारें।


आध्यात्मिक विश्वविद्यालय, चंद्रपुर 

माउंट कार्मेल के पास, मधुबन प्लाझा के बाजु में,

शिवाजी नगर, चंद्रपुर महाराष्ट्र 

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